श्रीमहंत नारायण गिरी जी Facebook

History

                                                      ॐ हौं जूं स: ॐ भू र्भुव: स्व: | ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम् ||

                                                      उर्वारुक मिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात | स्व: भुव: भू ॐ स: जूं हौं ॐ ||

द्वादश ज्योतिर्लिंगों के अतिरिक्त अनेक ऐसे हिरण्यगर्भ शिवलिंग हैं , जिनका बड़ा अदभुत महातम्य है | इनमें से अनेक बड़े चमत्कारी और मनोकामना को पूर्ण करने वाले हैं तथा सिद्धपीठों में स्थापित हैं |

ऐसे ही सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ महादेव मठ मंदिर के अतिपावन प्रांगण में स्थापित हैं | स्वयंभू हिरण्यगर्भ दूधेश्वर शिवलिंग |

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रेभूतस्य जात: पतिरेक आसीत्

पुराणों में हरनंदी के निकट हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग का वर्णन मिलता है | हरनंदी,हरनद अथवा हिरण्यदा ब्रह्मा जी की पुत्री है और कालांतर में इनका नाम हिन्डन विख्यात हुआ | शिवालिक की पर्वत श्रंखलाओं से सहारनपुर से कुछ दूर से निकल हिन्डन पुराण प्रसिद्ध नदी है | इसने तीन छोटी जलधाराओं से मिलकर हिन्डन रूप धारण किया है | हिन्डन के दर्शन ,इसमें स्नान व पूजन से अनेक जन्मों के पाप-ताप सब स्वत: समाप्त हो जाते हैं –ऐसी मान्यता है |

हिन्डन के पावन तट पर तपस्या में लीन तपस्वियों के मंत्रोच्चारण से यहाँ का वातावरण पवित्र होता था | साथ ही इस क्षेत्र के दुर्गम वन प्रांतर में रहने वाले मारीच,सुबाहु और तड़का जैसे राक्षसी प्रवृति के मदांधों के अट्टहास से भी यह क्षेत्र कम्पायमान रहता था |

गाज़ियाबाद के पास बिसरख नामक एक गाँव है | पहले यहाँ घना जंगल था | रावण के पिता विश्वेश्रवा ने यहाँ तपस्या की थी | वह शिव के परम भक्त थे | अब गौतमबुद्धनगर ज़िले में पड़ने वाले रावण के पैत्रक गाँव बिसरख में आज भी वह पूजनीय है | इस गाँव में न तो रामलीला का मंचन होता है और न ही दशहरा पर्व मनाया जाता है | इस गाँव का नाम ऋषि विश्वेश्रवा के नाम पर विश्वेश्वरा पड़ा ,कालांतर में इसे बिसरख कहा जाने लगा |

त्रेतायुग में श्री रामावतार से पूर्व कुबेर के पिता महर्षि पुलस्त्य बिसरख क्षेत्र में ही निवास करते थे | महर्षि पुलस्त्य का विवाह महर्षि भारद्वाज की बहन से हुआ था | कुबेर इसी भाग्यशाली दम्पति के सुपुत्र थे | कुबेर ब्रह्मा जी के पौत्र तथा भगवान् शिव के अनन्य मित्र और देवलोक के कोषाध्यक्ष थे | अपनी व्यस्तताओं के कारण कुबेर के पास इतना समय नहीं था कि वह अपने पिता को भी थोडा समय दे सके | इसी के चलते महर्षि पुलस्त्य अपने बेटे से न मिल पाने के कारण कुंठित रहा करते थे | कुबेर को भी अपने पिता की सेवा न कर पाने का कष्ट था ,लेकिन समयाभाव के कारण इस समस्या का कोई समाधान उनके पास नहीं था |

महर्षि पुलस्त्य प्रकांड विद्वान थे | उन्होंने एक दिन सोचा ‘यदि पुत्र कुबेर के परम मित्र ओढरदानी भगवान् शिव को प्रसन्न कर उन्हें अपने पास रख लूँ तो समस्या का समाधान स्वत: हो जायेगा | कुबेर अपने परम मित्र शिवजी से मिलने आया करेगा तो मैं भी उससे मिल लिया करूँगा | पल दो पल ही सही मेरा पुत्र कुबेर मेरे पास बैठ लिया करेगा | बाप-बेटे दुःख-सुख की बातें कर लिया करेंगे |’

यही सबसे सही उपाय है ---ऐसा सोच कर महर्षि पुलस्त्य ने भगवान् शिव को प्रसन्न करने के लिये कठोर तप करने का निर्णय लिया | बिसरख की भीड़-भाड़ व चहल-पहल तपस्या में व्यवधान उत्पन्न करती इसलिये महर्षि पुलस्त्य ने हिन्डन के निकट घने वन को अपनी तपस्या के लिये चुना | उन्होंने भगवान् भोले नाथ की वर्षों तक निरंतर आराधना की | बिना किसी बाधा के जारी उनकी तपस्या ने अपना रंग दिखाया | महर्षि पुलस्त्य की सिद्धि यहाँ तक पहुँची की वे स्वयं भगवान शंकर के रूप हो गये |

महर्षि पुलस्त्य की तापोराधना से प्रसन्न होकर भगवान् भोलेनाथ माता पार्वती सहित साक्षात प्रगट हुए | भगवान् शिव ने महर्षि पुलस्त्य से कहा ---‘मैं तुम्हारी आराधना से अत्यंत प्रसन्न हूँ | मैं काशी और कैलाश में वास करता हूँ | तुम्हारी इच्छा है की मैं यहाँ वास करूँ | काशी तो मेरे त्रिशूल पर टिकी है ,दूसरा त्रिशूल मेरे पास नहीं है ,इसलिये यहाँ काशी तो बन नहीं सकती | हाँ ,यदि तुम चाहो तो यहाँ कैलाश जरुर बन सकता है |’

इसपर महर्षि पुलस्त्य ने कहा –‘प्रभो ! आप यहाँ कैलाश बनाने की आज्ञा दें और उसी में वास करें ---इसमें मेरा स्वार्थ तो निश्चित रूप से है लेकिन जनकल्याण की भावना भी इसमें निहित है | आपके आशीर्वाद से जन-जन का कल्याण अनंतकाल तक होता रहेगा |’

महर्षि पुलस्त्य ने जिस स्थान पर घोर तप किया और शिवस्वरूप हो विश्वेश्रवा कहलाये ; जिस स्थान पर भगवान् शिव ने विश्वेश्रवा को माता पार्वती के साथ साक्षात् दर्शन दिये और उन्हें कैलाश बनाने की आज्ञा दी ,जिस स्थान पर अपनी पहचान के रूप में भगवान् भोलेनाथ हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग छोड़ गये ,वही स्थान आज श्री दूधेश्वर नाथ महादेव मठ मंदिर के नाम से जाना जाता है | यही वह अति पावन ज्योतिर्लिंग है , जिसके दर्शन मात्र से भक्तों की मनोकामनायें पूर्ण हो जाती हैं | यही वह मंगलकारी दूधनियन्ता भगवान् भोलेनाथ का दूधेश्वर लिंग है जिसके अभिषेक से जन्म-जन्म के पापों से मुक्ति मिल जाती है

शिव साधक विश्वेश्रवा का पुत्र रावण भी अपने तपस्वी पिता की भांति ही भगवान् शिव का अनन्य भक्त था | शिवजी के प्रति रावण की भक्ति जगविदित एवं अनुकरणीय है | अपने पिता के तपोबल से विकसित कैलाश में हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग श्री दूधेश्वर की रावण ने भी वर्षों तक साधना की थी | रावण यहाँ तब तक श्री दूधेश्वर का अभिषेक करता रहा था जब तक महर्षि विश्वेश्रवा सपरिवार स्वर्ण नगरी लंका में नहीं जा बसे थे |

इसी पुराण वर्णित हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग को श्री दूधेश्वर नाथ महादेव के नाम से जाना व पूजा जाता है |

                                                                           कलियुग में प्राकट्य

कलियुग में प्राकट्य पूर्व ग्राम्य क्षेत्र कैलाश का अपभ्रंश कैला गाँव श्री दूधेश्वर नाथ महादेव ज्योतिर्लिंग के निकट ही है | पुराणों में वर्णित हरनंदी (हिन्डन ) आज भी पास ही बहती है | स्वयंभू श्री दूधेश्वर नाथ शिवलिंग का कलयुग में प्राकट्य सोमवार , कार्तिक शुक्ल ,वैकुन्ठी चतुर्दशी संवत् 1511 वि० तदनुसार 3 नवंबर ,1454 ई० को हुआ था | इस दिव्य लिंग की ही तरह कलियुग में इसके प्राकट्य की कथा भी बड़ी दिव्य है |

निकटवर्ती गाँव कैला की गायों को चरवाहे टीले पर चराने के लिये लाते थे | गायों को चरने के लिये छोडकर ग्वाले पेड़ों के नीचे विश्राम करते थे | टीले के निकट ही एक तलाब था ,उससे गायें जल पिया करतीं थी | जब गायें टीले पर एक स्थान विशेष पर पहुंचतीं तो उनके थनों से स्वत:दूध टपकने लगता था | यह बड़ी विचित्र बात थी ,जिसकी ओर ग्वालों ने कभी ध्यान ही नहीं दिया था | लेकिन कभी-न-कभी तो किसी का ध्यान इस ओर जाना ही था |

हुआ यूँ कि जब शाम के समय गायें अपने-अपने मालिकों के घर पहुँचतीं और उनका दूध निकालने का उपक्रम किया जाता तो कई गायें बिल्कुल दूध नहीं देती थीं तथा अनेक बहुत कम दूध देती थीं | जब किसी न किसी गाय के साथ ऐसा होता पाया गया तो चर्चा शुरू हुई | चर्चा मे सबसे पहली बात तो यही कहि गयी यह चरवाहों की करतूत हो सकती है | गायों को घर पहुँचाने से पहले ही वे उनका दूध निकाल लेते हैं | लेकिन सभी लोग इस बात से सहमत नहीं थे क्योंकि ज्यादातर चरवाहे पीदियों से नगरवासियों की गायें चरते आ रहे थे और कभी किसी की ऐसी शिकायत नहीं मिली थी |

मगर प्रश्न तो सिर उठाये खड़ा ही था कि गायों का दूध आखिर चला कहाँ जाता है ?

लगातार चर्चा के बाद यही निर्णय हुआ की हो न हो चरवाहे ही गायों का दूध निकाल कर पी जाते हैं ,इसलिये उन्हें धमकाया जाये ताकि वे अपनी हरकत से बाज आयें | इस विचार के साथ ही गाँव वालों ने ग्वालों को धमकाया ---‘तुम गायों का दूध निकालकर पी जाते हो ,ऐसा करते तुम्हें शर्म नहीं आती | गाय के दूध की चोरी जैसा पाप क्यों करते हो ?’ ग्वालों ने कहा ---‘हम कसम खा कर कहते हैं कि गायों का एक बूंद दूध भी हमने आज तक नहीं निकाला | हम पर ऐसा लांछन मत लगाओ | हम बिल्कुल निर्दोष हैं |

इस पर नाराज गाँव वालों ने कहा ---‘अगर तुम निर्दोष हो ,अगर तुम निरपराध हो ,अगर तुम सच्चे हो तो फिर कौन गायों का दूध निकालकर ले जाता है –बताओ ! देखो भई ! इस सारे मामले में दोष तुम्हारा ही बनता है | अब यह जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही है कि खुद को निर्दोष साबित करो और दूध चुरानेवाले को हमारे सामने लाकर खड़ा करो |

चरवाहे थे तो बिल्कुल निरपराध ,निर्दोष | मगर मामला उन्हें ही सुलझाना था | उन्हें इस बात की चिन्ता सताने लगी कि इस झूठे आरोप से कैसे मुक्ति पाई जाये ? कैसे गाँव वालों को अपने निर्दोष होने का विश्वास दिलाया जाये ? ग्वालों ने परस्पर विचार-विमर्श किया और निर्णय किया कि सभी ग्वाले गाय चराते समय पूरी तरह से सजग व सतर्क रहेंगे |

निर्णय के अनुसार समस्त ग्वाले दिनभर चौकस रहते | पेड़ों के नीचे बैठते जरुर ,मगर सोते नहीं थे | उन्होंने इस बात का पता लगाना शुरू किया कि कौन उन्हें बदनाम करने के लिये यह नीच हरकत कर रहा है |

एक दिन अचानक ग्वालों ने देख की गायें इधर-उधर चरती रहीं तो कुछ नहीं हुआ लेकिन जैसे ही टीले के ऊपर एक स्थान विशेष पर पहुँची तो उनके थानों से दूध स्वत:ही चुने लगा | कुछेक गायों के थनों से तो बाकायदा दूध की धार ही बहने लगी | जैसे ही गायें उस स्थान विशेष से अलग हटीं उनके थनों से दूध टपकना बन्द हो गया | इस अनोखी घटना को देख सभी चरवाहे हतप्रभ रह गये | यह महान आश्चर्यजनक घटना थी | चकित ग्वालों को एक बात की तो तसल्ली हो गयी कि अब उनपर लगा दूध चोरी का लांछन हट जायेगा |

शाम को लोटकर चरवाहों ने गाँवमें गायों के मालिकों से उक्त घटना के बारे में बताया तो सभी ने उनकी इस बात को मानने से इंकार कर दिया | गाँव वालों ने ग्वालों से कहा ---‘तुम एक झूठ को छिपाने के लिये अब दूसरा झूठ बोल रहे हो | ऐसी मनघडंत कहानी किसी और को सुनाना | हम क्या तुम्हें इतने मुर्ख दिखाई देते हैं कि तुम्हारी इस बेसिर-पैर की कहानी को सच मान लेंगे | चुपचाप असली बात बताओ ,नहीं तो तुम्हारे हक में अच्छा नहीं होगा |’

ग्वालों ने गोपालकों को समझाने का बहुत प्रयास किया लेकिन मामला ढ़ाक के तीन पात वाला साबित हुआ | गौपालक उनकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं थे | अन्त में काफी बहस के बाद तय हुआ कि अगले दिन ग्वालों के साथ गोपालक भी जायेंगे और घटना की सत्यता की स्वयं जाँच करेंगे

दुसरे दिन गायों के साथ ग्वाले व गाँव वाले भी टीले की ओर चल पड़े | टीले के पास गायों को चरने के लिये छोड़ दिया गया | गायें टीले पर इधर-उधर बिखर गयीं | ग्वालों के साथ ही उत्सुक गाँव वाले भी पेड़ों की छावं में बैठ गये | काफी देर के इंतजार के बाद गाँव वालों ने अपनी आँखों से उस चमत्कार को अपने सामने होते देखा ,जिसके बारे में चरवाहों ने उन्हें बताया था | टीले के स्थान विशेष पर पहुँची कुछ गायों के थानों से स्वत: ही दूध टपकने लगा | बाद में कुछ गायों के थानों से दूध की धार भी बहते देखी |

गाँव वालो को ग्वालों की बात पर विशवास हो गया था ,उन्होंने ग्वालों से क्षमा मांगी और उन्हें गाँव में पहुँच कर सबके सामने दोषमुक्त कर दिया | इस विचित्र चमत्कारी घटना की खबर जंगल में आग की तरह आस-पास के तमाम क्षेत्रों में फैल गई | हर तरफ यही चर्चा हो रही थी ---‘क्या कारण है की स्थान विशेष पर गायों के पहुँचने पर दूध की धार स्वत: गिरने लगती है |’

गाँव वालों ने फैसला किया की उस स्थान की खुदाई करके इस अदभुत दैवी रहस्य से पर्दा उठाया जाये | उधर कोट नामक गाँव में उच्चकोटि के ,दसनामी जूना अखाड़े के एक जटिल सन्यासी सिद्ध महात्मा को स्वप्न मे भगवान् शिव ने दर्शन देकर इस महत्वपूर्ण स्थान पर पहुँचने का आदेश दिया | भगवान् शंकर के आदेश का पालन करते हुए सिद्ध संत शिष्यों सहित इस पावन स्थल पर पहुँच गये |

खुदाई का काम शुरू हुआ ,शीघ्र ही एक जलहरी और एक दिव्य शिवलिंग द्रष्टिगोचर हुआ | गाँव वाले इस अदभुत शिवकृपा से अभिभूत थे | इस दिव्य स्थान पर जल स्रोत भी होना चाहिए ---ऐसा बुजुर्गों ने विचार किया | खुदाई करने पर पास ही एक अनोखा कुआं निकला | जिसका जल कभी गंगाजल जैसा ,कभी दूध जैसा सफ़ेद तो कभी मीठा होता था | यह कुआँ आज भी सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ मठ मंदिर में विधमान है |

मंदिर प्रांगण में वह ऐतिहासिक धूना है जो दूधेश्वर लिंग के प्राकट्य के पावन दिवस से आज भी जागृत है | इस धूने में इस मठ-मंदिर से जुड़े सिद्ध –संतों ने अनगिनत आहुतियाँ दी हैं | सैकड़ों वर्षों से सदैव जागृत ईस धूने की विभूति धारण करने से जहाँ मन को अपार शान्ति मिलती है ,वहीं कार्यसिद्धि का वरदान भी प्राप्त होता है | नित्यप्रति अनेकों भक्त इस पावन धूने में सामग्री की आहुतियाँ देकर अपने इष्ट भगवान् भोलेनाथ को प्रसन्न करते हैं |

                                                                           शिवाजी द्वारा जीर्णोद्धार

लगभग चार सौ वर्ष पूर्व औरंगजेब काल में मराठा वीर शिरोमणि छत्रपति शिवाजी अपने लाव –लश्कर के साथ यहाँ पधारे थे | शिवाजी कट्टर सनातनधर्मी और परम आस्तिक थे | उनका सम्पूर्ण जीवन देव-मंदिरों की रक्षार्थ समर्पित था | भगवान् दूधेश्वर लिंग के दर्शन कर छत्रपति महाराज धन्य हो गये | उन्होंने मंदिर के जीर्णोद्धार का संकल्प लिया |

शिवाजी महाराज ने यहाँ हवन भी किया था | उनके द्वारा जमीन खुदवा कर गहराई में बनवाया गया हवन-कुंड आज भी यहाँ मौजूद है | इसी हवन-कुंड के निकट वेद विद्यापीठ की स्थापना वर्तमान श्रीमहंत नारायण गिरी जी महाराज ने की है ,जिसमे देश के कोने-कोने से आये विद्यार्थी वेद का ज्ञान अर्जित कर रहें हैं | कहा जाता है कि औरंगजेब के कारागार से निकल भागने के बाद छत्रपति शिवाजी यहाँ आये थे और यहाँ एकांत में हवन-पूजन व भगवान् दूधेश्वर का अभिषेक करने के बाद ही मराठा सैनिक मुगलों के दांत खट्टे करने के लिये निकला करते थे | यह क्रम काफी लम्बे समय तक चला था | पण्डित गंगा भट्ट द्वारा राजतिलक किये जाने के उपरांत शिवाजी ने श्री दूधेश्वर नाथ महादेव की महिमा से प्रभावित होकर महाराष्ट्र में एक गाँव बसाकर उसका नाम दूधेश्वर ग्राम रखा ,जो आज भी स्थित है | यह भी कहा जाता है कि शिवाजी महाराज ने महाराष्ट्र प्रस्थान से पूर्व पूर्ण विधि-विधान से श्री दूधेश्वर नाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था |